Sunday, December 20, 2009

शांति वार्ता का आँखों देखा हाल

खरगोशलैण्ड वन के सारे खरगोश खुश थे। हों भी क्यों नहीं, उनके पड़ौसी भेडि़यालैण्ड वन से एक हाई लेवल पीस डेलिगेशन जो आ रहा था! इस डेलिगेशन के कई एजेण्डे थे जिनमें सबसे प्रमुख था– सदियों से दोनों वनों के बीच नफरत का जो दरिया बह रहा था, उसका बहाव रोककर उसके स्थान पर गाजर की खेती करना ताकि दोनों वनों में दशकों से चल रही खाद्य समस्या का समाधान हो सके। खरगोशलैण्ड के खरगोशों ने एल ओ सी पर पड़ौसी वन के डेलिगेशन का स्वागत किया। खरगोशलैण्ड के सबसे मनोरम घास के मैदान में दोनों पक्षों के बीच पीस डायलॉग आरंभ हुआ।
भेडि़यालैण्ड का मुखिया बोला–‘यह बहुत ही बुरी बात है कि दोनों वनों के बीच केवल नफरत की नदी जितनी दूरी है किंतु हम अच्छे पड़ौसियों की भांति नहीं रह सकते। आपने आसपास के सारे वनों में हमारे विरुद्ध अनर्गल प्रचार कर रखा है कि भेडि़यालैण्ड के भेडि़ये रात के अंधेरे में खरगोशलैण्ड में घुसकर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देते हैं। मैं पूछता हँू कि क्या आपके पास कोई प्रमाण है?’
खरगोशलैण्ड के मुखिया ने यह बात सुनकर अत्यंत गुस्से से कहा–‘हम अपने अतिथियों का सम्मान करते हैं किंतु आप हमसे प्रमाण न मांगें। सारे वनों के जानवर जानते हैं कि सदियों से भेडि़यालैण्ड के जानवर खरगोशलैण्ड के जानवरों पर हमले करते आये हैं।’
भेडि़यालैण्ड के मुखिया ने कहा–‘केवल आरोप लगाने से कुछ नहीं होगा। आप प्रमाण दीजिये।’
खरगोशलैण्ड के मुखिया का उत्साह ठण्डा पड़ गया। वह बोला– ‘हम कई बार प्रमाण दे भी चुके हैं लेकिन आप उन्हें मानते ही नहीं।’
भेडि़यालैण्ड का मुखिया बोला– ‘क्या प्रमाण देते हैं आप? यही न कि कुछ मरे हुए खरगोशों की खालें और खरगोशलैण्ड की आबादी में लगातार कमी आने के आंकड़े? ये तो कोई प्रमाण नहीं। क्या खरगोश अपनी मौत नहीं मरते? आप उनकी खालें गिनाकर और उनकी घटती हुई संख्या गिनाकर हमें दोषी ठहराते हैं?’
खरगोशलैण्ड के मुखिया के पास कोई जवाब नहीं था। उसका चेहरा उतर गया। उसकी ऐसी पतली हालत देखकर भेडि़यालैण्ड का मुखिया मुस्कुराया–‘महाशय! यदि आप सचमुच अपने वन की उन्नति चाहते हैं तो नफरत फैलाना छोडि़ये। हमारे साथ सहयोग कीजिये। वर्षों पहले हमने जो कांटों की बाड़ दोनों वनों के बीच लगाई थी, उसे हटाइये। दोनों वनों के बीच निर्बाध पारगमन आरंभ कीजिये। हमारे भेडि़यों को खरगोशलैण्ड में आने दीजिये, अपने खरगोशों को हमारे यहाँ भेजिये। ऐसा करके ही दोनों वनों में विकास का नया अध्याय लिखा जा सकता है’
खरगोशलैण्ड के मुखिया ने माथे से पसीना पौंछते हए कहा– ‘क्या हम अगले एजेण्डे पर वार्ता कर सकते हैं?’
–‘हाँ–हाँ, क्यों नहीं। हम चाहते हैं कि दोनों वनों के बीच बह रही नफरत की नदी को रोककर उसके स्थान पर गाजर की खेती की जाये।’
–‘यह तो हम भी चाहते हैं।’
–‘जब आप भी यही चाहते हैं और हम भी, तो फिर हमें ऐसा करने से कौन रोकता है?’
–‘आपका इतिहास। जो हमें आप पर विश्वास नहीं करने देता।’
–‘बिल्कुल गलत कह रहे हैं आप, आपके अविश्वास का कारण हमारा इतिहास नहीं है, आपका अपना कायराना अंदाज है।’
–‘हम कायर नहीं हैं, शांति के पुजारी हैं।’
–‘कौनसी शांति? जो आपके और हमारे बीच कभी स्थापित नहीं हुई, वह शांति?’
–‘हम शांति चाहते हैं किंतु आप होने नहीं देते।’
–‘आपकी समस्या यह है कि आप शांति स्थापित नहीं करना चाहते, केवल उसका ढिंढोरा पीटना चाहते हैं।’
खरगोशलैण्ड का मुखिया हैरान था। हजारों खरगोश खाने के बाद भी भेडि़यों का मुखिया खरगोशों पर शांति स्थापित नहीं होने देने का आरोप धर रहा था। उसकी यह कहने की हिम्मत भी नहीं रही कि आपने भी तो कभी अपने भेडि़यों के मँुह पर खरगोशों का खून लगा हुआ देखा होगा ।

3 comments:

  1. अच्छी रचना बधाई। ब्लॉग जगत में स्वागत।

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  2. मुझे श्रीलाल शुक्ल की बेहतरीन रचना राग दरबारी रोमांचित करती है आप के ब्लाग पर इस शब्द को और आप के लेख कर देख कर और अच्चा लगा

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  3. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी टिप्पणियां दें

    कृपया वर्ड-वेरिफिकेशन हटा लीजिये
    वर्ड वेरीफिकेशन हटाने के लिए:
    डैशबोर्ड>सेटिंग्स>कमेन्टस>Show word verification for comments?>
    इसमें ’नो’ का विकल्प चुन लें..बस हो गया..कितना सरल है न हटाना
    और उतना ही मुश्किल-इसे भरना!! यकीन मानिये

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